Tuesday, August 30, 2011

चांद का मेरे भी इक नाम है

चांद का मेरे भी इक नाम है
इक चांद के लिये ही मेरा भी दिल बेकरार है
वो आता है फलक पर और करवट बदलता है
रात कि सिलवटों पर मेह की बूँदें बिखेरता है

वो आता है तो सारा रास्ता झूम उठता है 
उसके आने से रजनीगंधा भी महक उठती है
और न जाने कहाँ से ये जुगनू भी आ जाते हैं
ओंदे ओंदे से दिल के दिए जलाते हैं

आता तो वोह हर ही रात को है
फिर भी उसका इंतज़ार मुझे छत तक खींच लाता है
टिमटिमाते तारों में नम होती पलकों से
उसके दीदार का नशा ही कुछ और है

जिस रोज़ नहीं आता वोह
मुझसे ये दिल भी नहीं मानता
तब रात गुजर जाती है
पर आँखों का सन्नाटा नहीं मानता

फिर अगली रात जब वो नानी सी मुस्कान लिए आता है
उसके खेल पे गुस्सा होके भी उसकी अटखेलियों पे प्यार आता है
फिर रास्ते झूम उठते हैं, और जुगनू नांच उठते हैं
वो तो ज्यों ही हँसता रहता है ... फिर मैं भी हंस देती हूँ

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