कैसे बताऊँ तुझे, तुझे कितना प्यार करता हूँ
रूठ के तू चली जाती है, मैं सिसकता रहता हूँ
क्या बताऊँ तुझे तेरे आंसुओं का, रिश्ता है मेरी कशमकशसे
दामन भीगाके तू ठहर जाती है, फिर उस नमी में मैं दहकता रहता हूँ
कैसे बताऊँ तुझे मेरी जाँ भी तेरी कर्ज़दार है
सांसोसे मेरी तू रूह चुरा ले जाती है, बच जाती है जो नफ्ज वो गीत तेरे गुनगुनाती है
क्या बताऊँ तुझे तेरी हंसी का क्या सिलिसिला ये बिन बयाँ है
हंस के तू चल देती है, और नगमा में बन जाता हूँ
कैसे बताऊँ तुझे तुझे आँखों में समेटने के लिए जाँ निकली जाती है
नखरों के खेल में शर्मा तू देती है, फिर उफ्फ्फ्फ़.... शायर में बन जाता हूँ
कैसे बताऊँ तुझे तुझे मेरी नज़रों ने क्या देखा है
तू अप्सरा नहीं ना मल्लिका-ए-नूर है, तू चाँद का दीदार है या सितारों की दीवानगी
Friday, July 15, 2011
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